1980 से पहले ही मिट गया था अकेला गांव का अस्तित्व: भरत चौहान

देवेंद्र सिंह राय

उत्तराखंड -विगत 2 दिनों से समाचार पत्र की सुर्खियां एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की हेडलाइंस में जौनसार बावर के अकेला गांव सुख सुविधाओं के अभाव में पलायन की खबरें आ रही है परंतु सच क्या है यह भी जानने की आवश्यकता है ।
देहरादून जनपद के जौनसार बावर क्षेत्र जो यमुना एवं टोस नदी के मध्य स्थित है यह क्षेत्र अपनी पौराणिक मान्यताएं, संस्कृति, रीति रिवाज एवं सामूहिक जीवन पद्धति के कारण विश्व विख्यात है, उत्तराखंड में यदि सबसे कम पलायन हुआ है तो वह यमुना घाटी का क्षेत्र है ।
जिस गांव के पलायन की हम चर्चा कर रहे हैं यह गांव 1980 से पहले उजड़ चुका था इस गांव में अधिकांश परिवार राजमिस्त्री (बढ़ई – खन्ना) के थे जो विभिन्न गांव में जाकर के बस गए यदि मैं यह कहूं कि इस गांव का सुख सुविधा के अभाव में पलायन हुआ है तो यह सत्य नहीं है ।
1980 में जो सुख सुविधाएं अन्य गांव में थी वह इस गांव में भी थी परंतु इस गांव के लोगों का मुख्य कार्य भवन निर्माण का था यह विडंबना ही है कि जिन्होंने संपूर्ण जौनसार बावर में भवन निर्माण के कार्य किये वह गांव स्वयं ही उजड़ गया और यह लोग रिश्तेदारी में अथवा भवन निर्माण करने जहां भी गए वहीं बस गए ।
मीडिया में तनिक इस बात की खोज अवश्य करनी चाहिए की घटना कब की है कैसे घटी ? यह गांव खत कोरु के 17 गांव में से एक था जो जैन्दोऊ गांव के पृष्ठ भाग में बसा हुआ था, भौगोलिक दृष्टि से यदि हम खत कोरु के अन्य गांवों को देखे तो वह एक ही ढलान पर बसे है जबकि यह गांव एकांत में था संभवतः इस गांव का नाम अकेला इसीलिए पड़ा होगा ।
प्राकृतिक से सुरक्षा की दृष्टि से एवं मानवीय परिवर्तित स्वभाव के कारण जौनसार बावर के अनेक ऐसे और भी गांव रहे हैं जिनका या तो अस्तित्व समाप्त हो गया या वह अनंत्र जाकर के बस गए ।

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