मजदूरों की मजबूरियों पर मरहम लगाती सोनिया गांधी

बांकेलाल निषाद

अंबेडकरनगर -किसी भी स्वस्थ समाज और देश के लिए कोरोना जैसे महान त्रासदी में गरीब और अमीर, ऊंच-नीच, जात-पात में भेदभाव ठीक नहीं होता है। उस समाज और देश के लिए यह हीनभावना उस देश और समाज को कलंकित करता है। इस समय हमारे देश में कोरोना महामारी से मजदूरों के साथ भेदभाव बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। चीन के वुहान शहर में जब कोरोना ने दस्तक दिया था और धीरे-धीरे उसका संक्रमण विश्व के चुनिंदा देशों में फैल रहा था तो उस समय हमारे देश के प्रधानमंत्री विदेश में फंसे भारतीय नागरिकों एवं छात्रों को उनके गंतव्य स्थान पर पहुंचाने के लिए हवाई जहाज भेजकर उन्हें उनके घर तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया और पहुंचाया भी। हमारे कुछ चुनिंदा चैनल, प्रिंट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इस कार्य की खूब सराहना की थी और उन्हीं के माध्यम से कोरोना धीरे-धीरे भारत में भी अपना पैर पसारना शुरू कर दिया । बाद में देश में लाक डाउन की स्थिति बन गई और इस लाक डाउन से सबसे बड़ी मार यदि किसी पर पड़ी है तो वो है मजदूर वर्ग ।सरकार ने मजबूत वर्ग को तो लाने के लिए हवाई जहाज भेजकर उनके गंतव्य स्थान पर तो पहुंचा दिया लेकिन मजदूर और मजबूर वर्ग के लिए सरकार के पास ट्रेन ,बस आदिसेवा कुछ भी नहीं है । हमारे देश का भूखा प्यासा मजदूर बेचारा अपना घर-परिवार छोड़कर रोजी रोटी के चक्कर में फंसा पड़ा दूसरे शहर और राज्य में अपने घर आने के लिए व्याकुल है, परेशान है त्रस्त है। मैले, कुचैले , भूख, प्यास से त्रस्त कुछेक मजदूर और मजबूर वर्ग ,साइकिल से, पैदल, ट्रक से पिकअप से मजदूर एन केन प्रकारेण किसी तरीके से अपने गंतव्य स्थान पर आ रहा है तो उस पर वह पुलिस की लाठियां खाने के लिए मजबूर भी हो रहा है, उस पर डंडे बरसाए जाते हैं, उसको उठक बैठक कराया जाता है ऐसा लगता है मानो चीन अमेरिका इटली से यही मजदूर वर्ग ने हवाई जहाज से भारत में कोरोना वायरस फैलाया है । किसी भी टीवी चैनलों पर या किसी भी इलेक्ट्रॉनिक ,प्रिंट मीडिया या सोशल मीडिया पर यह देखने को नहीं मिला कि मजबूत वर्ग के पीठ पर भी लाठियां बरसी हो । कोरोना वैश्विक महामारी का रूप ले चुका है इससे पूरी दुनिया बचने के लिए त्रस्त परेशान हैं ।हमारा देश इस समय हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण के नशे में बेहोश पड़ा है। इस त्रासदी के बावजूद भी इन मजबूर मजदूरों की मजबूरियों पर कोई मरहम लगाने वाला नहीं मिला । इन मजदूरों की मात्र इतनी ही परेशानी है कि ये अपने प्राण अपने परिवार के बीच ही त्यागना चाहते हैं । ये भूखे -प्यासे अपने परिवार में ही रहना चाहते हैं। इनकी चाहत मात्र इतनी ही है कि इन्हें सकुशल उनके घर तक पहुंचा दिया जाए। 1 मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस बुत चुका है लेकिन इसके बावजूद भी हमारे सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा। आज हमारे देश का मजदूर वर्ग जिसकी रीढ़ पर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी है , जिनकी खून पसीने से सिंचित भारत समृद्धि की गाथा गाते दिखता है आज यही मजदूर वर्ग अपने घर नहीं पहुंच पा रहा है। मात्र इनकी इतनी इच्छा को हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्रियों के बीच सांठगांठ नहीं बन पा रहा है। इनके पास व्यवस्था मजबूत वर्ग के लिए नहीं है। मजदूरों के मजबूरियों पर मरहम लगाने का एक आशा की किरण विपक्ष की सोनिया गांधी के रूप में इनको गंतव्य स्थान पर पहुंचाने के लिए ट्रेन का फ्री किराया अपने पास से मुहैया कराने के लिए संकल्पित हुई। सोनिया गांधी ने बताया की ट्रेन का जितना भाड़ा होगा मैं इन मजदूर वर्ग के लिए वाहन करूगी और इन्हें सकुशल उनके घर तक पहुंचाया जाए। सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि ये मजदूर वर्ग भारत की आत्मा है इनके सहयोग के लिए मैं सब कुछ करने के लिए तैयार हूं ।हमारा मजदूर यह सुनकर बड़ा खुश हुआ होगा कोई आवाज हमारे पक्ष में उठ रहा है। अब देखना है कि सरकार सोनिया गांधी के इस बात पर कितना अमल करती है। मजबूर मजदूर को उनके गंतव्य स्थान तक पहुंचाने के लिए कितनी तत्परता दिखाती है सरकार। पक्ष और विपक्ष के सहयोग से यदि मजदूर अभी भी अपने गंतव्य स्थान पर समय रहते पहुंच जाएं तो भी यह हमारे देश के लिए बहुत बड़ी सौभाग्य की बात होगी कि कम से कम मजदूर के लिए उन्हें भी लोकतंत्र का एहसास रहेगा कि इस लोकतांत्रिक देश में हमारी भी कद्र है ।नहीं तो इस देश की हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण की बहती धारा, धर्म के नशे में मदमस्त मतवाले हाथी की तरह झूमते इस देश में कौन उनकी चीखों, पुकारो को सुनने वाला है। काश इस देश के सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता गण इन मजदूरों को समय रहते इनके हंसते खेलते परिवार में इनको पहुंचा देते तो यह देश इस समय धन्य हो जाता।

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