स्वाधीनता संग्राम के दौरान का बड़ा थाना सदरपुर आला मकाम

रिपोर्टर रमेश दीक्षित

सीतापुर -ज़िले का एक गांव है सदरपुर लेकिन इसको सब जानते है ,जिसका कारण है यहाँ ज़िले का पुराना थाना है,स्वाधीनता संग्राम के दौरान यहा का थाना बड़ी चर्चा में रहा जहा सेनानियों को पकड़ कर लाया जाता था,महमूदाबाद तहसील का ये गाँव बिसवां से बड़ी नहर के किनारे होते हुए गोडैचा मार्ग पर स्तिथि है,यहाँ के तमाम पुराने खंडहर और भवन इसकी प्राचीनता की सनद है,ये इलाका किसी समय एक घने जंगल के रूप में था,जो जहांगीर के साशन काल मे 17 वी सदी में आबाद हुआ,आज यहां किले के खंडहर उसका टीला और वहां बनी गाव की जामा मस्जिद इसकी शान है ,इसके अलावा यहा अजमेरी पीर की एक दरगाह भी है ,जो लोगो की बड़ी अकीदत का केंद्र है,इस दरगाह पर पिछले 62 सालो से साल के आखिरी दिनों में एक बड़ा मेला लगता है ,सदरपुर के इस मेले का कई किताबो और रिसालों में हवाला मिलता है ,गजेटियर के मुताबिक जहांगीर अपने शाशनकाल में महमूदाबाद आया था और उसका काफिला दिल्ली से जहांगीराबाद पहुचा था जिसके बाद वो महमूदाबाद गया (उन दोनों जगहों का जिक्र आपको आगे की पोस्ट्स में पढ़ने को मिलेगा)हालांकि सरकारी अभिलेख बादसाह के जहांगीराबाद से महमूदाबाद जाने का जिक्र करते है लेकिन मेरा मानना है कि वो सदरपुर होते हुए महमूदाबाद गए थे मैं इस बारे में इसी पोस्ट में आपको इसके तथ्य भी दूंगा
तो आइए चलते है ज़िले के तारीखी गांव सदरपुर और वहां की खूबसूरत और आलीशान मस्जिद में
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बादशाह अकबर ने हिंदुस्तान के होने वाले शहंशाह जहांगीर को दीनी और इंसाफ की तालीम देने के लिए उज्बेकिस्तान बुखारा से उस्ताद हामिद अल्लामा को बुलवाया था ,जिन्होंने जहांगीर को बेहतर तालीम दी जिसके रहते इस मुल्क को सबसे इंसाफ पसंद बादसाह नसीब हुआ,वक़्त बीता जहांगीर हिंदुस्तान के बादसाह बने तो यकीनी तौर पर उस्ताद मोहतरम को भी दरबार में आला मकाम हासिल हुआ ,लेकिन एक बात बड़ी अजीब हुआ करती थी ,जब बादसाह सलामत आते तो उस्ताद को अपने स्थान पर खड़े होना पड़ता,बादसाह जहांगीर को भी ये मुनासिब नही लगता था लेकिन ये रवायत थी जिसे बदला भी नही जा सकता था,जहांगीर ने उस्ताद को वजारत की पेशकश की जिसे उस्ताद ने ठुकरा दिया ,तब जहांगीर ने कहा कि आप अपने मुताबिक कोई जगह देख ले हम आपको वहां का आमिल बना दे ,जानकारों के मुताबिक उस्ताद दिल्ली से किसी एकांत जगह की तलाश में निकले और पहले खैराबाद पहुचे उनके साथ बड़ा लाव लश्कर भी था,उस समय खैराबाद इस्लामी तारिख़ और व्यापार के हवाले से एक बड़ी जगह थी ,लेकिन उस्ताद का दिल इस इलाके में न लगा और वो आगे बढ़ते गए ,बिस्वा में चौपान शहीद के इलाके में होते हुए उनका काफिला आगे निकल पड़ा और आज के आबाद सदरपुर तक पहुचा,लेकिन वो एक सुनसान जंगल का इलाका था ,उस्ताद को अपने क़याम के लिए ये जगह दुरुषत लगी,उस समय यहा से 1 किलोमीटर भटपुरवा एक आबाद गांव हुआ करता था,लेकिन जब तक सदरपुर के इस इलाके में किले ,इबादतगाह और दीगर इंतजामात हुए उस्ताद नजदीक के बजेहरा गांव में रुके और यहा की तैयारियों का जायजा लेते रहे,जहा आज के दौर का थाना बना हुआ है वही उस्ताद की कचहरी बनी ,और सदरपुर में सभी जाति बिरादरियों की बस्ती बादशाही के मुताबिक आबाद की गई,उस वक़्त इस इलाके के अगल बगल के 52 गांवों का उस्ताद को आमिल बनाया गया,उस्ताद की खनकहि सिलसिले में गहरी दिलचस्पी थी लिहाजा एक बड़े बुजुर्ग जिनका उस्ताद बड़ा एहतराम करते थे अजमेरी पीर भी साथ मे आये ,जिन्होंने बाद में यही पर्दा भी किया उनकी दरगाह यही पर तमीर है जिस पर हर बरस शानदार उर्स और मेला होता है,जब सरकारी रिकॉर्ड जहांगीर के जहांगीराबाद से महमूदाबाद जाने का हवाला देते है तो मेरा मानना है तब जहांगीर रास्ते मे पड़ने वाले इस इलाके में अपने उस्ताद से मिलने और उनका इलाका देखने यहा जरूर आया होगा ,और तभी जहांगीर ने मुगल सल्तनत की तरफ से अपने उस्ताद मोहतरम को “सदर ए आजम “का खिताब दिया ,इसके बाद से ही ये बस्ती सदरपुर के नाम से जानी जाने लगी ,
इस जगह पर पुराने किले और कचहरी के खंडहर तो मिलते ही है उस्ताद ने उसी वक़्त इबादत के लिए मस्जिद भी तामीर कराई जिसे जामा मस्जिद के नाम से जानते है ,बाद के सालो में इस मस्जिद में और तमाम काम हुए जिसके रहते ये मस्जिद बेहद खूबसूरत और विशाल है यहा तकरीबन एक हजार लोग एक साथ नमाज पढ़ सकते है ,आप मस्जिद को देखे तो इसकी नक्काशी और बनावट में मुगलिया दौर की शानदार वास्तुकला के दर्शन होते है ,जो जहांगीर के काल मे कला और संस्कृति के आला दर्जे की पहचान है ,ये इलाका अरसे से इस्लामिक स्टडीज का भी बड़ा केंद्र रहा है ,
लॉक डाउन के बाद जब भी वक़्त मिले ,तो सदरपुर जाकर इस मस्जिद को देखना और अजमेरी पीर की दरगाह पर जियारत करने कतई न भूले ,बिस्वा तक आ जाइयेगा तो हमे एक बार फिर आपके साथ इस तारीखी जगह पर चलना और अच्छा लगेगा

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