प्रधानों पर फूटेगा कोरोना हार का ठीकरा

बांकेलाल निषाद

अंबेडकरनगर -हम्मै ऐसन तैसन नै समझ्या हम गौंवा कै प्रधान हयी। साधारण मनई न बाटी हम कलयुग कै भगवान हयी।। जी हां शासन की दृष्टिकोण में यह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है। देश-विदेश से पलायन कर रहे मजदूर अपने घरों की ओर करोड़ों की संख्या में कूच कर रहे हैं। व्यवस्था के नाम पर ग्राम प्रधान उन्हें या उनके घर में ही क्वॉरेंटाइन करेगा या किसी नजदीकी विद्यालय अथवा आंगनबाड़ी केंद्रों पर उन्हें 21 दिन तक क्वॉरेंटाइन करेगा। परदेसी बाबू की ब्यवस्था की सारी जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की होगी क्योंकि वह निगरानी समिति का अध्यक्ष है। उसके सहयोग में पहले से ही ग्राम समिति में एनम के माध्यम से स्वास्थ्य विभाग प्रिंसिपल के माध्यम से शिक्षा विभाग ,आशा ,आंगनबाड़ी कार्यकत्री, सफाई कर्मी आदि लोग रहेंगे ।ग्राम प्रधान की पूछ बढ़ गई है या यूं कहें उनके ऊपर जिम्मेदारी का बोझ चारगुना हो गया है । ग्राम प्रधान की यह जिम्मेदारी बनेगी कि परदेसी बाबू को उनके घर में क्वारेंटाइन करें उनके घर पर पोस्टर लगवाए उनकी थर्मल स्क्रीनिंग करवाएं और वह जैसे ही गांव में प्रवेश करते हैं तो तत्काल सूचना संबंधित अधिकारी को दे। यह पूरी जिम्मेदारी ग्राम प्रधान की है और उसके सहयोग में ब्लॉक से लेकर जिले तक सारे अधिकारी रहेंगे ।अब एक नजर ग्राम प्रधान के कोरोना के पहले भूमिका पर देखें ।ग्राम प्रधान पंचायती राज के गठन से ही निगरानी समिति का अध्यक्ष रहा है। गांव में कोई आफत विपत आती है तो उसकी सारी जिम्मेदारी प्राथमिक स्तर पर ग्राम प्रधान की होती है। उसके सहयोग में ग्राम पंचायत अधिकारी, ग्राम विकास अधिकारी, एनम ,प्रिंसिपल, आशा ,आंगनबाड़ी कार्यकत्री आदि लोग रहते हैं। पंचायती राज्य गठन के बाद गांव के चहुमुखी विकास की जिम्मेदारी ग्राम प्रधान को दी गयी है ।उसके ऊपर शुरू से ही गमन के आरोप लगते रहते हैं ।लोग उसे जन सूचना के माध्यम से परेशान करते रहते हैं । ग्राम प्रधान के ऊपर तमाम आरोप लगते रहते हैं जन सूचना के नाम पर प्रधान को दबाने का सबसे बड़ा अस्त्र सरकार द्वारा ला दिया गया है। प्रधान को दबाना हो तो जनसूचना सबसे बड़ा अस्त्र है। इसके बावजूद भी ग्राम प्रधान के ऊपर गुटबाजी ,चुनावी रंजिश में दंगा- फसाद ,मारपीट, लड़ाई- झगड़े का आरोप भी लगता रहता है । जिससे किसी न किसी गुट की तरफ से उसको भी मुकदमे में फंसा दिया जाता है। किसी तरीके से यदि वह मुकदमे से बाहर हो भी जाता है तो चुनाव के समय उसको इसका दंश झेलना पड़ता है। चुनाव के समय भी किसी न किसी गुट का वह शिकार हो जाता है । अनायास उसके ऊपर मुकदमा पुलिस महकमा ठोक देता है ।अधिकतर सीधे-साधे पढ़े-लिखे ग्राम प्रधान के ऊपर गैंगस्टर गुंडा एक्ट, छिनैती , डकैती, एससी एसटी ,छेड़खानी आदि के मुकदमे लद जाते हैं। कहने को तो पंचायती राज में उसके पास असीम पावर हैं लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है ।गांव में जीने मरने बदहाली, आगजनी ,मुकदमा कुछ भी होता है तो ग्राम प्रधान लपेटे में आ ही जाता है । इन समस्याओं से तो ग्राम प्रधान ग्रसित ही था अब उसके पास एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी परदेसी बाबू का भी आ गया है ।अब परदेसी बाबू के गुस्से को भी वह झेलेगा ।भोजन समय से मिला या नहीं मिला, खाना कच्चा है या पक्का है बाथरूम साफ है या नहीं नहाने धोने की व्यवस्था है कि नहीं सैनिटाइजर ,मास्क मिला या नहीं मिला यह सब झिड़कियां ग्राम प्रधान को सुनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है ।इसके बावजूद भी इन सब से फुर्सत पाएगा तो कहीं बीडियो का दौरा, तो कहीं एडीओ पंचायत का दौरा ,कहीं एसडीएम का दौरा आला महकमा का दौरा बराबर गांव में बना रहेगा। यदि गांव में कोई कोरोना पाजिटिव मिल भी गया तो उसका सारा ठीकरा ग्राम प्रधान के सर पर फोड़ा जाएगा। उसको सैकड़ों ग्रामवासियों, अधिकारियों, कर्मचारियों की झिड़कियां सुननी पड़ेगी। इतनी जिम्मेदारी के बावजूद भी ग्राम प्रधान को वेतन महज ढाई हजार प्रतिमाह मिलता है। वेतन ढाई हजार और काम ढाई हजार से भी ऊपर उसके सर पर लदा रहता है। बहरहाल शासन ग्राम प्रधान के ऊपर विश्वास किया है ।ग्राम प्रधान की जिम्मेदारी 4 गुनी हो चुकी है । इस व्यवस्था में ग्राम प्रधान परदेसी बाबू और आला अधिकारियों के बीच की रीढ़ और सेतु होगा । ब्लॉक तहसील के माध्यम से जिला महकमा पूरा प्रधान के माध्यम से जिम्मेदार रहेगा। बहरहाल ठीक-ठाक सब निकल गया तो ठीक है नहीं तो शासन की तलवार ग्राम प्रधान के गर्दन पर तो लटकी ही है जिससे बचना बचाना बड़ा मुश्किल दिख रहा है।

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