सद्गुरु के श्रीमुख से प्रसारण वाणी ही वेद है– स्वामी अड़गड़ानंद

बांकेलाल निषाद

अंबेडकरनगर -मानव मात्र का एकमात्र धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता तत्वद्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने अपने अध्यात्मिक प्रवास मध्यप्रदेश के सीधी जिले के बरचर आश्रम से भेजे अपने अध्यात्मिक संदेश में बताया कि भगवान एक है, धर्म एक है, शास्त्र एक है, ईश्वर एक है । उन्होंने वेद ,धर्म, कर्म , यज्ञ पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पुस्तकीय वेद मोक्ष प्रदान नहीं करते । ये तीनों गुणों (सत, रज, तम ) तक ही प्रकाश डालते हैं। इसके आगे का हाल ये नहीं जानते । गीता में वर्णित– “त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान”।। अर्थात अर्जुन तुम तीनों गुणों से ऊपर उठ, वेदों के कार्यक्षेत्र से आगे बढ़, जो ब्रह्म को जानता है वही ब्राह्मण है ,ब्राह्मण एक अवस्था है, स्थिति है। इसलिए वेदों से ऊपर उठ। किसी तत्वदर्शी महापुरुष के सानिध्य में जाकर भजन चिंतन करने से भगवत पथ का मार्ग प्रशस्त होता है ।उन्होंने बताया कि वेद का मतलब जानकारी होती है जो अविदित है वह विदित हो जाए वही वेद है। वेद परमात्मा के श्रीमुख का सीधा प्रसारण है। सद्गुरु के सानिध्य में भजन चिंतन से उनसे मिलने वाली प्रत्यक्ष जानकारी (शब्द ) को वेद कहते हैं ।जो साक्षात सद्गुरु के श्री मुख से निकली वाणी होती है जिसकेनुसार चलकर साधक तीनों गुणों से उपराम होकर परमात्मा के आधिपत्य में आ जाता है । जबकि श्री स्वामी जी ने बताया कि परमात्मा के श्री मुख से प्रसारित वेद के इतर अविवेकी जन –कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति। कामनाओं से युक्त वेद के वाक्यों में ही अनुरक्त स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं । इनकी बुद्धि अनंत भेद वाली होती है और वे अनंत शाखाओं के अनुसार अनंत क्रियाओं का विस्तार कर लेते हैं। शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ।जबकि स्वामी जी ने एक ही क्रिया निश्चयात्मक क्रिया (भजन- चिंतन -आराधना) पर बल देते हैं। इसी क्रिया को अपनाने से मानव मात्र का कल्याण संभव है । कर्म पर प्रकाश डालते हुए श्री स्वामी जी ने बताया कि कर्म पर संसार दिग्भ्रमित है। उनके अनुसार कर्म एक अराधना है चिंतन है अर्थात सतगुरु के सानिध्य में भजन चिंतन कर भगवत स्वरूप हो जाना ही कर्म है। यज्ञ पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि योग विधि यज्ञ है और यज्ञ को समझ कर उसको कार्य रुप देना ही धर्म है।

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