प्रवासी मजदूरों की बेबसी पर राजनैतिक ठहाका

बांकेलाल निषाद

वह तोड़ती पत्थर
देखा मैंने इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर…
कोई ना छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार ,…..
चढ़ रही थी धूप,
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू
रुई जो जलती हुई भू,
गर्द चिनगी छा गई
वह तोड़ती पत्थर।

अंबेडकर नगर -निराला जी की वह तोड़ती पत्थर शीर्षक नाम से लिखित यह कविता बड़ी ही मार्मिक ,हृदय विदारक एक मजदूर मजबूर महिला की कारुणिक दृश्य बयां करती है । निराला जी इस कविता में मजबूर गरीब महिला द्वारा तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के एक पथ पर देखकर इस हृदय विदारक मार्मिक कविता को उकेरा था लेकिन आज कोरोना के दृष्टिगत प्रवासी मजदूरों की बेबसी- लाचारी, मैले- कुचेला, भूखे -प्यासे, तमतमाती धूप में बेबस लाचार,छालेयुक्त पैदल चलने के लिए मजबूर हताश चारों तरफ निराशा की अंधकारमय माहौल में जीवन की आस लिए करोड़ों मजदूर इस कविता को चरितार्थ करते हुए अपने घरों की ओर कूच करने के लिए मजबूर है। उनके परिवार उनके सगे संबंधी में कोई इतना पहुंच वाला नहीं है कि उन्हें सकुशल उनके गंतव्य स्थान पर पहुंचा दें, न ही ये प्रवासी मजदूर इतने प्रभावशाली है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोगो का बाल बांका कर सके, ऊंचे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को हिला सके। यदि इतनी क्षमता इनमें होती तो इनके लिए भी जिस तरीके से हवाई जहाज से देश-विदेश के छात्रों, उद्योगपतियों ,राजनेताओं, अधिकारियों,प्रवासी भारतीयों को लाने में वे कब आए कब चले गए देश में कोई हल्लाबोल नहीं हुआ। कहीं कोई हल्ला गुहार, राजनीतिक चिल्लाहट, शोरगुल नहीं सुनाई दिया। तो ठीक इसी तरह इनमें भी हल्ला नहीं होता ।लेकिन आज हमारे देश की आत्मा ,देश के निर्माणकर्ता, फाउंडेशन को मजबूती देने वाले, देश की आबोहवा में केसर युक्त गंध देने वाले ,भारत की आत्मा में प्राण फूंकने वाले ,लाचार ,बेबस, मजदूर पर राजनीतिक ठहाका लगाया जा रहा है। ये मजदूर अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिए हवाई जहाज ,एसी ट्रेन नहीं मांग रहे हैं। ये भूखे पेट सकुशल अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचना चाह रहे हैं ।इनके लिए मात्र इतनी ही व्यवस्था चाहिए ।इन्हें हवाई जहाज में बैठे लोगों को पल-पल नाश्ता खाना लंच 4 – 5 घंटे की हवाई यात्रा नहीं चाहिए। ये 12 घंटा से लेकर 36 घंटा तक भूखे पेट के ही शर्त पर अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने मां-बाप के बीच बाकी बची हुई जिंदगी जीना चाहते हैं। लेकिन हमारे देश के पक्ष विपक्ष के नेता समाज सेवी,नौकरशाह, सरकार के पास इनके लिए इतनी ही समुचित व्यवस्था नहीं है। ये ट्रक ,बस, पिकअप में भूसे की तरह भर कर ,पैदल छालेयुक्त जाने के लिए मजबूर हैं । लाक डाउन सख्ती के नाम पर लाठी खा रहे ,मेडिकल जांच के नाम पर धूप में लाइन लगा रहे ,क्वारेंटाइन सेंटर के नाम पर भूखे रह रहे अपने परिवार बीवी बच्चों मां बाप से मिलने के लिए बेताब है। इतनी बेबसी के बावजूद भी इन पर राजनीति करने वाले अपनी राजनीति चमका रहे हैं ।नौकरशाह थर्मल स्क्रीनिंग, क्वारेंटाइन सेंटर, कम्यूनिटी किचेन, मास्क, सैनिटाइजर आदि इनके लिए सुविधा मुहैया कराने के नाम पर अरबों खरबों रुपए खारिज कर अपना थैली भरने के लिए भर रहे हैं ।इसके बावजूद भी इन मजदूरों को इससे कोई लेना-देना नहीं है। अपनी लाचारी बेबसी के कारण इन अबोध मजदूरों को नहीं पता कि आखिर उनका कसूर क्या है?। इन्हें यह नहीं पता कि यदि हम लोगों को पहले अपने परिवार घर व गंतव्य स्थान पर पहुंचा दिया गया होता तब हवाई जहाज से विदेश से लोगों को लाया गया होता तो कोरोना भारत में नहीं फैलता और न ही हमारी यह दुर्दशा होती । लेकिन आखिर राजनीति कैसे चमकती ? नौकरशाह की थैली कैसे भरती? देश में महामारी के नाम पर उनकी दुर्दशा पर राजनीतिक बिसात कैसे बिछती? क्वॉरेंटाइन सेंटर, मास्क, सैनिटाइजर ,मेडिकल टेस्ट के नाम पर मजबूर मजदूर को उपरोक्त सुविधा मुहैया कराने के नाम पर अरबों- खरबों रुपए खारिज कर पीएम केयर सीएम केयर का खाता शून्य हो जाय इनसे भी इन बेबस मजदूरों का कोई लेना-देना नहीं है। ये मजदूर दधीच की हड्डी की तरह अपनी सुख सुविधा का बलिदान देकर ऊंची अट्टालिकाओं की नींव मजबूत करने में लगे हैं । काश चुनाव का समय होता तो मतलब परस्त के लोग इनकी मदद में आगे आ जाते। ये बेचारे मजदूर बहुत ही भावनात्मक होते हैं। ऊंची अट्टालिकाओं में रहने वालों की तरह दिमाग से जुड़े हुए नहीं होते । सत्ताधारी लोग इन मजबूर मजदूर की भावना का मौके का खूब फायदा उठा रहे हैं और भविष्य में भी जब चुनाव आएगा तो भी फायदा उठाएंगे। इन बेबस मजदूर को कोरोना खत्म के बाद सत्ता के गलियारों में रहने वाले लोगों द्वारा हिंदू मुस्लिम करके इनका अपने पक्ष में ध्रुवीकरण कर इनका भावनात्मक दोहन करके इन्हें वर्तमान दुर्दशा से भुलवाया जाएगा। इनकी आज की टीस को हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण में ,जात पात में, जय श्री राम, बोल बम की गूंज में ,हाय हुसैन हाय हुसैन की आगोश में भुलवाया जायेगा। हमारे देश की राजनीतिक स्तर इतना गिर चुका है कि इन्हें बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा ,बेकारी ,भूखमरी, मजदूरों की बेबसी लाचारी पर बात करके ऊंचे स्तर के राजनीतिक महल को नहीं खड़ा करने की आदत है । बल्कि हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण, जात-पात, संप्रदाय देश को टुकड़े-टुकड़े करने वाली राजनीतिक बू पर ही ये अपनी राजनीतिक बिसात कायम करना चाहते हैं ।और हमारे देश के अधिसंख्य जनसंख्या ,अशिक्षित, बेरोजगार ,अबोध लोग इनके बहकावे में आकर राजनीतिक शिकार हो जाते है ।यदि आज एक प्रवासी मजदूर अपने जेहन में इस दुर्दशा को संजोए रखकर एक राय होकर एक अलख जगाते तो इनकी बेबसी पर राजनीतिक ठहाका लगाने वालों का तख्तापलट हो जाता । हमारे देश के राजनेता शायद यह भूल गए हैं कि इन्हीं मजदूर की ताकत से रूस में तख्तापलट हुआ था और इस वैश्वीकरण में भारत में भी इन मजदूरों को भी अपने अंदर आज इस बेबसी की क्रांति को जलाए रखने की जरूरत है। समय आने पर अपनी इस क्रांति की एक चिनगारी से इन राजनीतिक ठहाका लगाने वालों को भस्मासात कर सकता है ।आज यह देख लो हमारे देश के मजदूर कश्मीर से कन्याकुमारी तक तुम एक हो ,एक रहो, तुम्हारी बेबसी पर तुम्हारे साथ कोई नहीं खड़ा है । टीवी चैनल वाले तुम्हारी बेबसी को दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ा बना रहे हैं। तुम्हारे बेबसी , लाचारी पर, भूखमरी पर राजनीत हो रही है। अपने अंदर एक क्रांति की अलख जगाओ और संविधान में मिले वोट की ताकत के माध्यम से राजनीतिक ठहाका लगाने वालों को मुंहतोड़ जवाब चुन-चुन कर देना । जिससे ये भविष्य में फिर तुम्हारे साथ तुम्हारी बेबसी में तुम्हारी मजबूरी में तुम्हारे साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े रहे। तुम अपनी ताकत को पहचानो। स्वामी विवेकानंद की उस लाइन में अपनी उद्गार को मिलाओ। उन्होंने कहा है कि तू अपने आप को कमजोर मत समझो तुम ब्रह्मांड में हलचल मचा सकते हो। तुम अपने घर परिवार में जाओ और इन राजनैतिक ठहाका लगाने वालों से जब तक बदला न ले लो तब तक जागो और लोगों को जगाओ। अपनी संवैधानिक ताकत से इन्हें सबक सिखाओ । जय जवान ,जय किसान, जय विज्ञान में जय मजदूर को जोड़ो।

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