सदगुरू का छत्रछाया ही वास्तविक पर्यावरण है— स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज

अंबेडकरनगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद

अंबेडकरनगर -विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज बरचर आश्रम में मानव मात्र का एकमात्र धर्म शास्त्र यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व द्रष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने बताया कि महापुरुषों/सदगुरूओं का अपने भक्तों पर छत्रछाया, वरदहस्त ही वास्तविक पर्यावरण है । उन्होंने बताया कि जिस प्रकार से जीव-जंतु के अस्तित्व हेतु बाहरी आवरण पर्यावरण का होना आवश्यक है उसी तरह से मानव जीवन भी आध्यात्मिक आवरण में जीना अति आवश्यक है । जिस तरह से बाह्य जगत में पेड़ पौधे आदि लगाना चाहिए उसी तरह से मानव जीवन को सफल बनाने के लिए भजन ,चिंतन सतगुरु की सेवा आदि करते रहना चाहिए । स्वामी जी ने बताया कि मानव जीवन परिवेश हमेशा धार्मिक आवरण में ही जीना चाहिए और अनुशासित रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि पर्यावरण दो शब्दों, परि + आवरण से पर्यावरण बना है अर्थात जो हमको चारों तरफ से ढके हो सुरक्षित किए हुए हो उसे पर्यावरण कहते हैं । जब साधक सद्गुरु के दिशा निर्देशन में भजन, चिंतन, सेवा करते हुए यंत्र वत आत्मिक पथ पर अग्रसर होता है तो सद्गुरु/ भगवान परमात्मा उसे उठाने, बैठाने, सुलाने ,जगाने अर्थात चारों तरफ से उसको संभालने लगते हैं । उसके सारे दुख-सुख की जिम्मेदारी महापुरुष अपने हाथ में ले लेते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि ”
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
” परमात्मेति चाप्युक्तो देहेअस्मिन्पुरुषः परः।।

अर्थात वह पुरुष उपद्रष्टा- ह्रदय देश में बहुत ही समीप होता है हाथ ,पांव ,मन, जितना आप के समीप है उससे भी अधिक द्रष्टा के रूप में स्थित है । भजन और क्रमोन्नति के बाद द्रष्टा का स्वरूप बदलकर अनुमन्ता- अर्थात अनुमति प्रदान करने लगता है, अनुभव देने लगता है , भर्ता – बनकर भरण पोषण करने लगता है, साधना और सूक्ष्म होने पर वही भोक्ता- हो जाता है , यज्ञ तप जो कुछ भी बन पड़ता है सबको वह पुरुष ग्रहण करने लगता है ,ग्रहण के बाद वाली अवस्था उसकी महेश्वर की हो जाती है अर्थात महान ईश्वर के रूप में वह परिणत हो जाता है । और इससे भी उन्नत अवस्था में वहीं पुरुष परमात्मेति चापयुक्तो- जब परम से संयुक्त हो जाता है तब वह परमात्मा कहलाता है। यही वास्तविक पर्यावरण है । उन्होंने बताया जैसे माता मीरा को जहर का प्याला दिया गया। सद्गुरु की कृपा से जहर अमृत में बदल गया और माता मीरा बच गयीं । गजराज हाथी को मगर खींच रहा था परमात्मा ने उस भक्त को भी बचा ली । द्रोपदी चीर हरण में सद्गुरु कृष्ण ने द्रोपदी की लाज रखी । गुरु महाराज जी के गुरु महाराज स्वामी परमानंद महाराज जी के सद्गुरु महाराज पूज्य सतसंगी महराज जी ने उन्हें हर पल, हर क्षण, हर कदम पर संभालते रहते थे उन्हें परमात्मपर्यंत तक की दूरी तय करने तक कहीं गिरने नहीं दिये संभालते रहे । उन्होंने बताया कि जब सतगुरु साधक को पकड़ लेता है तो सारी जिम्मेदारी सद्गुरु की हो जाती है ,साधक मात्र यंत्रवत उसके दिशा निर्देशन में आध्यात्मिक पथ का मार्ग प्रशस्त करता है ।साधक जुते हुए बैल की तरह मात्र हलवाहा के भरोसे चलता है और अंत तक साधक सद्गुरु का कृपा पात्र बना रहता है ।संपूर्ण जिम्मेदारी उठाना, बैठाना, सुलाना, जगाना ,भरण -पोषण कराना, खतरों से अवगत कराना संभालना आदि चहुंदिशि जिम्मेदारी सद्गुरु की रहती है। यही वास्तविक पर्यावरण है । स्वामी जी ने बताया कि सद्गुरु- साधक के इस संबंध को प्रकृति में वह क्षमता नहीं है कि इस संबंध को खत्म कर दें । सद्गुरु के कृपा पात्र साधक रूपी पर्यावरण को न ही कोई शस्त्र काट सकता है ,न ही अग्नि जला सकते है, न ही इसे जल गीला कर सकता है और न ही इसे आकाश सुखा सकता है।

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