गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा गुरुर साक्षातपरब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः । ।

पर्वों का महापर्व है गुरु पूर्णिमा

अंबेडकरनगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद

पर्वों का महापर्व है गुरु पूर्णिमा

सृष्टि की अनादिकाल से अनंत ब्रह्मांड में आज तक जितनी भी परंपराएं रही है उनमें गुरु -शिष्य परंपरा सबसे पवित्र परंपरा, पवित्र संबंध , वंदनीय, पवित्र बंधन, सास्वत , और अद्वितीय परंपरा रही है । दुनिया की सभी परंपराएं चराचर जगत में क्षणभंगुर की तरह आई और गयी लेकिन यह गुरु शिष्य परंपरा अनादिकाल से अबाध गति से चली आ रही हैं । दुनिया के तमाम संप्रदाय, धर्म, जाति आदि परंपराओं के हिसाब से पर्व और त्योहार मनाए जाते हैं लेकिन वह इसी संसार तक सीमित है और क्षणिक हैं । जबकि गुरु शिष्य परंपरा के बीच गुरु पूर्णिमा जो पर्वो का महापर्व है सबसे पवित्र और सास्वत पर्व माना जाता है । इसकी शुरुआत आज से 5200 वर्ष पूर्व चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में महर्षि वेदव्यास ने श्रुति परंपरा का खंडन करते हुए अनादि काल से चले आ रहे गुरु शिष्य परंपरा की पवित्र बंधन को संजोते हुए गुरु पूर्णिमा मनाने का शुभारंभ किया । आज ही के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है.। आषाढ़ मास में शुरू होता है इसलिए आषाढ़ पूर्णिमा भी इसे कहा जाता है। इसी दिन शिष्य द्वारा अपने गुरु की उपासना की जाती है । गुरु को ही माता- पिता, देव ,ब्रह्मा विष्णु, महेश आदि से सुशोभित किया गया है ,महिमामंडन किया गया है ।

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरा गुरुर साक्षातपरब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः । ।
अखंड मंडलाकाराम व्याप्तम येन चराचरं, तत्पदंदर्शितं एनं तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।अर्थात गुरु को बिंदु से लेकर सारी सृष्टि को चलाने वाले अनंत शक्ति का जो परमेश्वर तत्व है वहां तक सहज संबंध है। इस संबंध को जिनके चरणों में बैठकर समझने की अनुभूति पाने का प्रयास करते हैं वही गुरु है सद्गुरु है भगवान हैं परमेश्वर हैं ईश्वर हैं । जैसे सूर्य के ताप से तपती भूमि को बर्षा से शीतलता और फसल पैदा करने की ताकत मिलती है वैसे ही गुरु चरणों में शिष्यों को ज्ञान शांति भक्ति भजन और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है । इस परंपरा को अनादिकाल से इसलिए पवित्र माना जाता है कि क्योंकि इस गुरु शिष्य के ज्ञान में जहां तक शिष्य का भजन चिंतन करते शरीर छूट गया है अगले जन्म में पुनः गुरु कृपा से वहीं से अध्यात्मिक की पढ़ाई भजन चिंतन की पराकाष्ठा की शुरुआत करता है न कि जीरो से । यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व दृष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज बताते हैं कि गुरु द्वारा दिए गये अपने शिष्य के ज्ञान में भजन चिंतन की क्रमोन्नति चार सोपानों में जिसमें बैखरी, मध्यमा ,पश्यन्ती और परा में यदि साधक की पढ़ाई पश्यन्ति मे शिष्य की शरीर छूट गयी तो अगले जन्म में वह पश्यंती से ही ज्ञान की पढ़ाई की शुरुआत करेगा और अपने सद्गुरु की कृपा से अंततः परा के बाद परमात्मा की सहज स्वरूप की प्राप्ति कर लेता है न कि बैखरी से शुरुआत करेगा । इसीलिए स्वामी जी बताते हैं कि परमात्मा की सहज स्वरूप की प्राप्ति के लिए शिष्य को गुरुत्व प्राप्त करने में भगवान श्री कृष्ण को 13 वर्ष लगे, महात्मा बुद्ध को 200 बर्ष लगे ,महात्मा महावीर स्वामी को 24 वर्ष लगे और खुद स्वामी अड़गड़ानंद जी के गुरु स्वामी परमानंद जी को कुल सात जन्म लगे । शिष्य अपने गुरु की कृपा से जन्म जन्मांतर तक अपने अच्छे बुरे संस्कारों को काटते काटते अंततः ग्रुरूत्व की प्राप्ति कर लेता है और परमात्मा का सहज स्वरूप, परम सत्य परमात्मा में विलय और खुद सद्गुरु ,महापुरुष ,भगवान, ईश्वर के रूप में परिणत हो जाता है । स्वामी अड़गड़ानंद जी बताते हैं कि आज गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्य अनादिकाल से अपने गुरु से दूर कहीं भी रहता है लेकिन आज के दिन वह अपने गुरु चरण वंदना के लिए अपने गुरु के पास आता है और उनकी चरण वंदना करता है पूजा पाठ करता है और ब्रह्म विद्या, अध्यात्मिक ज्ञान भजन चिंतन के संबंध में अपने शंका का अपने सद्गुरु महापुरुष से वार्ता कर या कृपा पात्र बनकर अपने शंकाओ का निर्मूल समाधान करता है। अपने सद्गुरु का कृपा पात्र बनकर आध्यात्मिक ज्ञान से भरपूर अपने अंतःकरण को आलोकित करता है ।इसलिए इस पर्व का गुरु शिष्य परंपरा में विशेष महत्व है। अनादिकाल से यह परंपरा जन्म जन्मांतर तक चली आ रही है । गुरु पूर्णिमा पर दूर-दराज से अपनी ब्रह्मविद्या के शंकाओं का निर्मूल समाधान करने व गुरु की चरण वंदना ,पूजा पाठ ,कृपा पात्र बनकर शिष्य पुनः अपने गंतव्य स्थान पर चला जाता है और उसे उनका सद्गुरु महापुरुष उन्हें अपने आध्यात्मिक ज्ञान से बराबर शिष्य को दुनिया के किसी भी कोने में रहे उसे संभालते पढ़ाते लिखाते रहते हैं । गुरु की शिष्य को संभालने की इसी योग्यता पर गुरु के विषय में यह कहा गया है
“गुरु बसे बनारसी शिष्य लगावे नेह एक पल बिसरत नहीं एक हंस दो देह”
गुरु की इसी योग्यता के कारण सद्गुरु को भगवान ईश्वर महापुरुष आदि कहा गया है। वह अपने आप में पूर्ण होता हैं ,अनंत अनित्य ,शाश्वत, सनातन, अविनाशी आदि महिमा मंडनों से गुरु को विभूषित किया गया है और वे अपने शिष्य को गुरु ही बना कर छोड़ते हैं जब तक उनका शिष्य गुरुत्व नहीं प्राप्त कर लेता तब तक गुरु शिष्य को उठाते बैठाते खिलाते पिलाते जगाते रहते हैं और बराबर संभालते रहते हैं । शिष्य यदि दुनिया के कहीं भी किसी भी कोने में है उसको बराबर संभालते रहते हैं । और जिस गुरु के अंदर यह क्षमता नहीं पाई जाती वह खुद तो अंधेरे में रहता ही है और उसका शिष्य भी अंधेरे में ही रह जाता है जैसे कहा गया है कि

जा का गुरु है आंधड़ा चेला निपट निरंध ।अंधी अंधा ठेलिए दोऊ कूप परंत

अनादि काल से गुरु कृपा से ही शिष्यों ने दुनिया में बहुत बड़े बड़े कारनामे गुरु कृपा से ही किये हैं जैसे भगवान राम ,भगवान श्री कृष्ण ,महर्षि वेदव्यास ,बाल्मीकि, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, दयानंद सरस्वती ,स्वामी विवेकानंद ,कबीर ,तुलसीदास और 21वीं सदी के यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व दृष्टा महापुरुष स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज आदि। अपने गुरु कृपा से ही ये लोग चराचर जगत में बहुत से बड़े बड़े कारनामे कर दिखाए हैं । आज के दिन पूरी दुनिया में अनेक धर्म संप्रदाय में शिष्य अपने गुरु की पूजा कर रहा है ।समत्व को प्रदान कर देने वाली सत्ता को ही सद्गुरु कहा जाता है । शिष्य की अपने गुरु से यही चाहत रहती है कि उसे भी समत्व प्रदान हो जाए । जैसा की सर्वविदित है कि अनादिकाल से आध्यात्मिक विद्या ,ब्रह्मविद्या ,सांसारिक विद्या से अलग होती है इसमें सांसारिक पढ़ाई लिखाई कोई मायने नहीं रखती । अध्यात्मिक पढ़ाई और ब्रह्म विद्या आदि सांसारिक पढाई से अलग ही होती है। जब शिष्य गुरु कृपा से गुरुत्व प्रदान कर लेता है तो उसमें वह क्षमता आ जाती है कि वह खुद गुरु कृपा से उसके मुखारविंद के निश्रित वाणी से अनंत वेद वाक्यों ,वेदों ,पुराणों, ग्रंथों अध्यात्मिक संबंधित तमाम ज्ञान का जगत में प्रसारण हुआ। जैसे महर्षि बाल्मीकि, जिनको राम राम कहने नहीं आता था उनके मुखारविंद से गुरु कृपा से रामायण गीता जैसी दुर्लभ ग्रंथों की रचना कर दी । महर्षि पाणिनि सद्गुरु की कृपा से ही संस्कृत के प्रकांड व्याकरणाचार्य विद्वान बने जिन पर आज के यूजीसी स्कॉलर बड़े-बड़े शोधकर्ता शोध कार्य करते हैरान और परेशान हैं लेकिन अंत नहीं पा रहे हैं । 14 वीं सदी के कबीर दास के बारे में उन्होंने खुद कहा है कि मसि कागज छूयो नहीं। कलम गह्यो नहिं हाथ।। लेकिन इसके बावजूद भी गुरु कृपा से उन्होंने ऐसे ऐसे गूढ़ पदों ग्रंथों की रचना की है कि बड़े-बड़े यूजीसी स्कॉलर उस पर शोध करते हैं लेकिन फिर भी उसके अंत तक नहीं पहुंच पाते हैं । 21 वी सदी के यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व दृष्टा महापुरुष स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज सांसारिक पढ़ाई में कक्षा तीन तक पढ़े हैं लेकिन उन्होंने अपने सद्गुरु स्वामी परमानंद महाराज जी की कृपा से दर्जनों किताबों को लिख डाला है। उन्हीं की निश्रित वाणी का परिणाम यथार्थ गीता है जिसको पढ़ने के बाद ऐसा नहीं लगता कि यह सांसारिक पढ़ाई के प्रकांड विद्वान न हो लेकिन हकीकत यही है इस संसारी पढ़ाई में वे शून्य हैं लेकिन अपने सद्गुरु की कृपा से उनकी निश्चित वाणी से यथार्थ गीता आत्मानुभूति एवं जीवनादर्श, पतंजलि योग शास्त्रीय प्राणायाम, एकलव्य का अंगूठा, भजन किसका करें जैसी दर्जनों किताबों एवं ग्रंथों को लिखा है । यह सब सद्गुरु की कृपा से ही संभव है। पढ़ाई ,ब्रह्मा विद्या ,भजन चिंतन, योग साधना आदि की शिक्षा संसारी गुरु नहीं बल्कि आध्यात्मिक गुरु देता है और यह एक ही प्रकार की शिक्षा अनादिकाल से जन्म जन्मांतर तक श्रुति परंपरा में चली आ रही थी जिसका सर्वप्रथम परंपरा का खंडन करते हुए गुरु शिष्य परंपरा के पवित्र बंधन में एक नया अध्याय जोड़ा जिसे कहते हैं गुरु पूर्णिमा । इसे आषाढ़ पूर्णिमा भी कहते हैं ।इस दिन से ऋतु परिवर्तन भी होता है। जैन, बौद्ध सनातन धर्म एवं अन्य संप्रदाय में इसीलिए इस गुरु पूर्णिमा का बड़ा महत्व है । आज इस संसार में सभी शिष्य अपने गुरु की चरण वंदना पूजा पाठ कर कृपा पात्र बने रहे हैं।

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