गुरु शिष्य परंपरा का अद्वितीय पर्व है गुरु पूर्णिमा –स्वामी अड़गड़ानंद

 

अंबेडकरनगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद

यथार्थ गीता के प्रणेता तत्व दृष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद जी महाराज ने आज पर्वों के महापर्व गुरुपूर्णिमा पर मध्य प्रदेश के सीधी जिला बरचर आश्रम में अपने भक्तों और संतो को समझाते हुए बताया कि सृष्टि के अनादिकाल से गुरु शिष्य परंपरा में गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पवित्र पर्व है जिसमें शिष्य अपने गुरु की चरण वंदना, पूजा-पाठ आरती करके अपने सद्गुरु भगवान को प्रसन्न करता है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करता है । इस पर्व पर शिष्य अपने गुरु भगवान से ज्ञान भक्ति ,ब्रह्मविद्या, ब्रह्म -चिंतन योग साधना आदि के विषय में विशद चर्चा कर अपने निर्मूल शंकाओं का समाधान करता है । इसलिए यह पर्व अद्वितीय पर्व माना जाता है। स्वामी जी ने बताया कि जन्म जन्मांतर तक अपने शिष्यों को अच्छे बुरे संस्कारों की काटने की क्षमता ,अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश का मार्गदर्शक, जन्म जन्मांतर तक भटके हुए अपने शिष्य को परमात्मा की सहज स्वरूप की प्राप्ति , देवों का महादेव ,सृष्टि का पालक नियंता, शाश्वत सत्य सनातन नित्य अविनाशी सर्वज्ञ सर्व व्याप्त सत्य का मार्गदर्शक परमपिता परमेश्वर का संदेशवाहक सद्गुरु होता है जिसके सामने बरसों से दूर जब शिष्य होता है तो सद्गुरु का कृपा पात्र बनकर वह तिरोहित ,आलोकित ,प्रकाश पुंज, भजन भाव से आत्म विभोर हो जाता है,। अपने सद्गुरु के सामने प्रणत हो जाता है और इसी गुरुपूर्णिमा के दिन पुनः सद्गुरु के दृष्टिपात से चार्ज हो जाता है। पुनः शिष्य अपने गुरु महाराज जी की चरण वंदना कर अपने गंतव्य स्थान आश्रम, जंगल, बिहार, विचरण करते हुए वापस चला जाता है । स्वामी जी ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के बाद शिष्य साल भर कहीं भी रहता है तो भी सद्गुरु उनको अपने सूक्ष्म शरीर से ब्रह्मविद्या से अपने शिष्यों को उठाते बैठा जगाते संभालते रहते हैं । जहां पर भी शिष्य गलती करता है तो उसके पहले ही गुरु भगवान उसको डांट फटकार कर उसे सही मार्ग पर चलने के लिए बराबर दिशा निर्देशन देता रहता है । स्वामी जी ने अपने सद्गुरु महाराज स्वामी परमानंद जी महाराज जी के कई दृष्टांतों के उदाहरण के माध्यम से लोगों को भक्तों को शिष्यों को समझाए कि कैसे गुरु महाराज हम लोगों को विचरण के समय संभालते डांटते फटकारते करते थे उसके संबंध में विस्तार से उन्होंने बताया और कहा कि शिष्य कहीं भी रहे गुरु बराबर उस पर नजर रखे रहता है । इसीलिए गुरु के बारे में कहा गया है
गुरु बसे बनारसी शिष्य लगावे नेह । एक पल बिसरत नहीं एक हंस दो देह।।

गुरु महिमा का बखान करते हुए स्वामी जी ने

श्री गुरु पद नख मनि गन ज्योति सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती
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शक्ल मोह तम सोस प्रकाशू। बड़े भाग उर आवहिं जासू ।।

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः। साक्षातपरब्रम्ह तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
अखंड मंडलाकाराम व्याप्तम येना चराचरम् । तत्पदंमदर्शितं एनं तस्मै श्री गुरुवे नमः ।।
आदि उदाहरणों से विस्तार से गुरु महिमा का मंडन किया।

स्वामी जी ने बताया कि यथार्थ गीता मानव मात्र का एकमात्र धर्म शास्त्र है या मजहब मुक्त है सृष्टि में कहीं भी कोई भी किसी भी जगह हो देश-विदेश में वह इसे पढ़कर इसके बताए मार्ग पर चलकर परमात्मा की सहज स्वर्ग की प्राप्ति कर सकता है । संसार में कहीं भी किसी भी जगह से कोई भी अपने आत्मा के कल्याण के लिए ओम का जप सद्गुरु का ध्यान और यथार्थ गीता के बताये मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा का कल्याण और परमात्मा के सहज स्वरूप की प्राप्ति कर सकता है । गौरतलब है कि अबकी बार स्वामी जी के दिशा निर्देशानुसार कोरोना महामारी के के चलते अपने घरों और आश्रमों में ही रहकर गुरु पूर्णिमा मनाने का दिशा निर्देश दिया गया था। जिसका पालन करते हुए परमहंस आश्रम शक्तेषगढ़ में नारद महाराज जी ने कमान संभालते हुए सोशल डिस्टेंसिंग ,सैनिटाइजर आदि की व्यवस्था के साथ गुरु पूर्णिमा बहुत ही सीमित संतो के बीच मनाया गया और वहीं पर स्वामी जी द्वारा बरचर आश्रम सीधी जिला मध्य प्रदेश में रहकर गुरु पूर्णिमा मनाये। इस अवसर पर स्वामी जी के साथ विनय बाबा, आशीष बाबा और सोहम बाबा उपस्थित रहे।

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