रुद्राभिषेक के धार्मिक औचित्य पर स्वामी अड़गड़ानंद जी के विचार *त्र्यम्बकं यजामहे ….*

अम्बेडकर नगर ब्यूरो बांकेलाल निषाद

(दिनांक 29/08 /२०२० को पुज्य महाराज जी द्वारा पालघर से बरचर आश्रम पधारने के पश्चात पालघर आश्रम के एक भक्त दीक्षित जी द्वारा मन्त्र *_’त्र्यंबकम यजामहे ….’, रुद्रीपाठ और रुद्राभिषेक के धार्मिक औचित्य_* की जिज्ञासा पर दिनांक 29/08/२०२० को पूज्य महाराज जी द्वारा प्रस्तुत विचार।)

आदिशास्त्र *श्रीमद्भगवद्गीता* में
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-
*यत: प्रवृत्तिर्भुतानां येन सर्वमिदं ततम्।*
*स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥*
(गीता १८/४६)
जिस परमात्मा से यवनमात्र जीव-जगत की उत्पत्ति हुई है, जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है उस परमेश्वर को *’स्वकर्मणा’ -* अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के द्वारा अर्चन-पूजन करके मानव परम सिद्धि को प्राप्त होता है, जिसके पश्चात कुछ भी पाना शेष नहीं रहता।
• स्वभाव में क्षमता शुद्र श्रेणी की है तो सेवा-स्तर का कर्म होगा लेकिन पूजा उसी परमात्मा की होगी जो तत्व रूप से सर्वत्र व्याप्त है।
• साधक की क्षमता वैश्य श्रेणी की है तो वह गो-संयम अर्थात् इंद्रिय-रक्षा, आत्मिक संपत्ति संग्रह के स्तर से पूजन में लगे लेकिन पूजन उसी परमात्मा का करना है जिसके तेज के अंश मात्र से सृष्टि का सृजन, पालन और परिवर्तन होता रहता है।
• क्षत्रिय श्रेणी का साधक है तो शौर्य, तेज, पराक्रम, साधनात्मक संघर्ष से पीछे हटने का स्वभाव के स्तर का कर्म होता है। किन्तु पूजन किसका करे? पूजन उस परमात्मा का ही करना है जो सर्वत्र व्याप्त है जिससे सभी की उत्पत्ति है।
• ब्राह्मण श्रेणी का साधक है तो स्वभाव में शाम, दम, तप शौच, मन का शमन, इंद्रियों का दमन, अनुभवी उपलब्धि, वास्तविक जानकारी, धारणा, ध्यान इत्यादि कर्म होते हैं, किन्तु वह भी भजन किसका करे? उसी परमेश्वर का जिससे सब भूतों की उत्पत्ति है, जिससे यह संपूर्ण जगत व्याप्त है।
इस प्रकार अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के द्वारा अर्चन कर मानव परम सिद्धि को प्राप्त होता है। गीता के अनुसार पूजा एक परमात्मा की। गीता का वर्ण साधना के आंतरिक सोपान हैं। गीता बाहर समाज में जातियों का बँटवारा नहीं करती।

*स्वकर्म एक ही साधक की साधना के चार क्रमोन्नत सोपानो के कर्म हैं जिन्हें गीता में वर्ण कहा गया है।* गीता की नकल करके व्यवस्थाकारों ने मानव समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जैसी चार ऊंच-नीच, घृणा मुलक जातियों और असंख्य उपजातियों में बांट कर उनके कार्यों को महापुरुषों के नाम से प्रचारित स्मृतियों में लिखकर एक परमात्मा की पूजा के स्थान पर प्रत्येक जाति के अनेकानेक देवी देवताओं का सृजन कर डाला। जैसे-
• शूद्र भूत-भवानी पुजे,
• क्षत्रिय दुर्गा की पूजा करे (वह भी हर परिवार की अपनी अलग-अलग दुर्गा))
• वैश्य लक्ष्मी की पूजा करे तो
• ब्राह्मण सरस्वती की।
परमात्मा की पूजा के लिए कोई जाति बची ही नहीं। ये समाज के विकृत रीति-रिवाज हैं। *गीता इनका समर्थन नहीं करती। गीता में जातिगत ऊंच-नीच है ही नहीं।* गीता के अनुसार सभी मनुष्य एक परमात्मा की संतान हैं। सबकी पूजा का परमात्मा एक, साधना एक और पूजन के अन्त में मिलने वाली परम सिद्धि सबके लिए एक समान है।
क्रमश:-

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