Trending

तो क्या मोदी-शाह की राजनीति की मियाद पूरी हुई

दिल्ली में केजरीवाल की जीत वैक्ल्पिक राजनीति से कहीं ज्यादा वैक्लपिक इक्नामी की जीत है । एक तरफ राष्ट्रवाद की चादर ओढे मोदी की राजनीति तो दूरी तरफ कल्याणकारी योजनाओ तले केजरीवाल की अर्थव्यवस्था । जिस दौर में मोदीइक्नामिक्स निजीकरण को ही जीडीपी से लेकर रोजगार और औघोगिक विकास से लेकर बाजार के लिये महत्वपूर्ण मान चुके है तब केजरीवाल की इक्नामिक्स ने वेलफेयर स्टेट का मतलब क्या होता है ये अमल में लाना शुरु किया । जाहिर है ये सोच जितने सरोकारो के साथ आम लोगो से दिल्ली में जुडी उसने झटके में केजरीवाल की साख बनाम मोदी की साख की प्रतिद्न्दिता खडी कर दी । एक तरफ मोदी के वादे थे तो दूसरी तरफ केजरीवाल सरकार के कार्य । और वोटरो से संकेत यही उभरा कि दिल्ली के चुनाव परिणाम अब ना सिर्फ बीजेपी बल्कि तमाम क्षत्रपो के सामने चुनौती है कि वह क्लयाणकारी राज्य की अवधारणा को दुबारा अपना लें । साथ ही सामानांतर में सवाल ये भी है कि केजरीवाल की जीत बीते छह बरस से मोदी की उस सियासी लकीर का अंत है जिसमें हिन्दु-मुस्लिम की राजनीति का अंत शुरु हो गया है । और संदेश साफ है कि ध्रुवीकरण की राजनीति देश में अनंतकाल तक चल नहीं सकती है । तो क्या दिल्ली का जनादेश वाकई देश की राजनीति को बदलने की ताकत के साथ उभरा है और अब मोदी-शाह की सत्ता को बीजेपी के भीतर से चुनौती मिल सकती है । या संघ परिवार के भीतर कोई कुलबुलाहट मोदी सत्ता को लेकर दिखायी दे सकती है । जाहिर है ये सारे सवाल है जिसने वैकल्पिक इक्नामी के तीन सवाल को चाहे अनचाहे जन्म दे दिये है । पहला, राष्ट्रवाद की सियासी परिभाषा तभी मान्य होगी जब अर्थशास्त्र अनुकुल हो । दूसरा , कारपोरेट मित्रो को लाभ देते हुये बाकियो को सरकारी एंजेसियो से डर दिखा कर खामोश करने से इक्नामी पटरी पर आयेगी नहीं । तीसरा , बैकिंग सेक्टर को कामर्शियल कामकाज की जगह सरकारी योजनाओ में फंसा कर सार्वजनिक उपक्रम को कौडियो के मोल बेचने की सोच से भी इक्नामी पटरी पर आयेगी नहीं । और यही से दिल्ली फैसले के बाद की राजनीतिक लकीर शुरु होती है जिसपर अभी तक मोदी सत्ता आंखे मूंदे रही या कहे केजरीवाल ने इसी शून्यता के बीच सरकारी स्कूल और मोहल्ला क्लिनिक का प्रयोग कर राजनीति की अपनी लकीर कहीं बडी खिंच दी ।

ध्यान दें तो दिल्ली में जाति – धर्म ही नहीं बल्कि अमीर-गरीब के बीच भी केजरीवाल सेतु बन गये । झोपडपट्टी बहुल 14 सीट हो या रईस और सरकारी बाबुओ की कालोनी समेटे 11 सीट । या फिर मिडिल क्लास और छोटे व्यापारियो की बहुसंख्यक वोटरो वाली 17 सीट । सभी जगह केजरीवाल का जादू चला । और इसी सामानातंर मुस्लिम बहुल इलाको की 9 सीटो पर भी केजरीवाल का असर रहा और बिहार-यूपी-बंगाल-झारखंड से दिल्ली में रोजगार की तालाश में पहुंचने वाले पूरबिया वोटर वाली 19 साटो पर भी आमआदमी पार्टी का असर रहा । यानी राजनीति की जो बिसात शाहीन बाग के नाम पर हिन्दू वोटरो को अलग करती । बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के अमितशाह के साथ खडे होकर चुनावी रैलिया करने पर पूरबिया वोटरो को बांट देती । या दर्जनभर कैबिनेट मंत्रियो के साथ पांच राज्यो के सीएम और सौकडो सासंदो का दिल्ली की गलियो में घूमना भी अगर केजरीवाल को डिगा नहीं सका तो इसका मतलब साफ है कि शिक्षा, स्कूल, अस्पताल, पानी , बिजली पर दिल्ली के खजाने से रुपये लुटाने में कोई कोताही ना बरतने का लाभ ही केजरीवाल को मिला । और यही से सबसे बडा सवाल खडा होता है कि क्या वाकई टैक्स पेयर का पैसा बीजेपी शासित राज्य या दूसरे क्षत्रप अपने सुविधाओ में उडा देते है । क्योकि दिल्ली के बजट में जितना पैसा शिक्षा ,हेल्थ, बिजली पानी पर खर्च का दिखाया गया वही खर्च किया गया । और इन सारी योजनाओ को सरकारी स्तर पर पूरा किया गया । यानी प्राइवेट सेक्टर के सामने प्रतिस्पर्धा करते हुये दिल्ली सरकार आगे निकली । जबकि केन्द्र सरकार की ही नीतियो को परखे तो तमाम सार्वजनिक उपक्रम ही नहीं बल्कि तमाम विदेशी आर्थिक समझौतो में भी कारपोरेट को ही ज्यादा भागेदारी दी गई । इसीलिये देश की जीडीपी जिस दौर में सबसे नीचे आ गई उस दौर में सरकार के कारपोरेट मित्रो के टर्न-ओवर में सबसे ज्यादा बढे । मुनाफा सबसे ज्यादा हुआ । तो क्या जनता की एवज में कारपोरेट को लाभ हुआ या फिर मोदी राजनीति के तौर तरीको ने जन-सरोकारो को छोडा और केजरीवाल ने राजनीति के सरोकारो को कल्याणकारी योजनाओ के जरीये साधा । यही वह स्थिति है जहा साख का सवाल होता है और मैसेज साफ गया कि दिल्ली के वोटरो का भरोसा प्रधानमंत्री से भी डिगा । जबकि अपनी दो रैली में झोपडपट्टी वालो को पक्का मकान देने । छोटे-मझोले व्यापारियो को जीएसटी की तिकडमो से मुक्ति । मध्यम वर्ग को टैक्स में रियायत का संदेश देने के बाद भी वोटर ने बीजेपी का साथ छोडा तो तीन नई परिस्थियो को बीजेपी या कहे मोदी-शाह के राजनीतिक प्रयोग के सामने खडा कर दिया है ।पहला, राज्यो को गंवाने का सिलसिला कार्यकत्ताओ को कैसे संभालेगा । दूसरा , बिहार और पं बंगाल को लेकर कौन सी राजनीति काम करेगी । तीसरा , शिवसेना ने जिस तरह वोटिंग के दिन बीजेपी को रोकने के लिये केजरीवाल की तारिफ की , क्या अब बीजेपी का साथ उसके सहयोगी छोडेंगे । यानी इन तीन सवालो की जमीन पर दिल्ली की वोटिंग के वह तौर तरीके है जिसमें मुस्लिम और निचला गरीब-दलित तबका तो जोश-शोर से वोट डालने निकला लेकिन बीजेपी का कार्यकत्ता ही इस बार जोर शोर से नहीं निकला । तो पहली बार सवाल ये भी उठा कि क्या पार्टी संगठन का ढांचा है वह चरमरा गया या शाह के सांगठनिक प्रयोग की उम्र पूरी हो गई । ठीक उसी तरह जिस तरह दिल्ली में तमाम राष्ट्रीय मुद्दो को उठाकर बीजेपी ने दिल्ली को देश की राजधानी से इसतरह जोडा जिसमें वोट देने वाला ये महसूस करें कि दिल्ली मोदी के राजनीतिक प्रयोग का केन्द्र है । और हार के बाद क्या कोई कह सकता है कि मोदी की राजनीति की मियाद भी पूरी हो गई । क्योकि बीजेपी के हार की कई तस्वीरे है , जिसमें सबसे बडी तस्वीर मोदी का कद बीजेपी से बडा होना है । क्षत्रपो की उपयोगिता भी मोदी-शाह के पंसद-नापसंद पर है । फिर बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा है लेकिन दिल्ली की बिसात जब अमित शाह ही बिछाते रहे । हर्षवर्धन या गोयल को दरकिनार कर मनोज तिवारी को तरजीह दी । और शाहीन बाग का प्रयोग खुले तौर पर वोटो के ध्रुवीकरण के लिये मोदी-शाह ने किया । जिसपर उग्र व अराजक राजनीति करने से वित्त राज्यमंत्री अनुराग सिंह ठाकुर और दिल्ली के सासंद प्रवेश वर्मा तक नहीं चुके । जो कि युवा है और दोनो ही पूर्व मुख्यमंत्रियो के बेटे है । तो संकेत साफ है जो बीजेपी शहरी पार्टी है । जो बीजेपी व्यापारियो की पार्टी है । जो बीजेपी हिन्दुओं की पार्टी है । वही बीजेपी इन्ही अपनो के बीच धराशायी हुई है जो कि बीजेपी के लिये भविष्य की राजनीतिक के लिये खतरे की घंटी है ।

Back to top button