महाशिवरात्रि के अवसर पर यथार्थ गीता पाठ का हुआ आयोजन””

बांकेलाल निषाद

जनपद अंबेडकरनगर -के तहसील जलालपुर अंतर्गत ग्राम सभा मथरा रसूलपुर में हसनपुर मड़ैया में विश्व गुरु, विश्व गौरव से सम्मानित तत्व दृष्टा महापुरुष परमहंस स्वामी श्री अड़गड़ानंद कृत यथार्थ गीता पाठ का आयोजन हुआ। जिसका भंडारा आज संपन्न हुआ। इस अवसर पर स्वामी जी के भक्तों द्वारा यथार्थ गीता पाठ का वाचन किया गया और सैकड़ों की संख्या में स्वामी जी के भक्तों एवं श्रद्धालुओं में प्रसाद ग्रहण कराया गया। इस अवसर पर स्वामी जी के जनपद आजमगढ़ के बहिरा देव आश्रम के प्रिय शिष्यों में एक पूज्य लोहा नंद जी महाराज सैकड़ों संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं एवं भक्तों के बीच प्रवचन के माध्यम से आशीर्वचन प्रदान किया। उन्होंने बताया कि प्रयाग कोई स्थली नहीं है ।संत समाज को ही प्रयाग कहा जाता है, प्रेम ही प्रयाग है ।उन्होंने बताया कि साधक जब सद्गुरु से प्रेम करता है तो धीरे-धीरे माया को छोड़कर सद्गुरु के सानिध्य में उनकी सेवा शुश्रूषा करके परमात्म पथ की तरफ बढ़ता है और उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होने लगता है। उसके अंदर सद्गुरु भगवान के प्रति प्रेम बढ़ जाता है धीरे-धीरे उसका ह्रदय ही प्रयाग हो जाता है। “सुनि समझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग” ।उन्होंने बताया कि भक्ति पथ में चार फल होते हैं धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष ।नाम जपते -जपते साधक के हृदय में देवी संपदा अर्जित होने लगती हैं इस अर्जन को ही अर्थ कहा जाता है। जिसके माध्यम से परमात्मा साधक को धारण करने लगता है, जिसे धर्म कहा जाता है और इसी तरीके से साधक के हृदय से कामनाएं समाप्त हो जाती हैं उसके अंदर केवल एक ही कामना रहती है परमात्मा की प्राप्ति ।यही है काम है । सद्गुरु की कृपा से साधक मोक्ष की तरफ बढ़ जाता है ।यही है चार फल जो सद्गुरु कृपा से ही संभव है। उन्होंने बताया कि मीराबाई अपने भजन में “पायोजी मैंने राम रतन धन पायो वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु कृपा करि अपना यो पायोजी मैंने राम रतन धन पायो।” वह अपने सदगुरु के माध्यम से राम रतन रूपी धन प्राप्त कर ली थी जिसके माध्यम से वह परमात्म पर्यंत की दूरी तय कर परमात्म स्वरुप हो गई । उन्होंने बताया कि यथार्थ गीता का पठन-पाठन यजन याजन करने से धीरे धीरे साधक संसार छोड़कर परमात्मा की तरफ बढ़ता है ।उन्होंने बाल्मीकि प्रकरण में बताया कि अंगुलिमाल ,बाल्मीकि बिल्कुल अज्ञानी थे ,लेकिन सप्त ऋषि और महात्मा बुद्ध के माध्यम से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने अथक परिश्रम कर सद्गुरु कृपा से साधन भजन करके परमात्मा पर्यंत की दूरी तय कर ली। उन्होंने बताया कि” पुरुष नपुंसक नारि वह जीव चराचर कोय”। पुरुष हो नारी हो नपुंसक हो संसार में कोई भी हो उसे भजन करने का अधिकार है ।उन्होंने बताया कि स्वामी जी द्वारा कृत यथार्थ गीता भगवान की वाणी है। यह एकमात्र मानव मात्र का धर्मशास्त्र है इसको 4 बार आवृत्ति करने से लोगों के अध्यात्मिक जीवन एवं भौतिक जीवन सुखमय हो जाता है।

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